सिविल लाइन थाना में समाधान दिवस, त्वरित निस्तारण के निर्देश!

मुजफ्फरनगर। थाना सिविल लाइन में पुलिस अधीक्षक नगर सत्यनारायण प्रजापत द्वारा समाधान दिवस आयोजित कर जनसमस्याएं सुनी गईं तथा उनके त्वरित व गुणवत्तापूर्ण निस्तारण हेतु संबंधित अधिकारियों को मौके पर…

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “श्री रामनवमी महापर्व की मंगलमयी वंदना!”श्री रामनवमी: धर्म, मर्यादा और राष्ट्रचेतना का दिव्य महा-उत्सवजब-जब इस धरा पर अधर्म का अंधकार गहराता है, जब मानव अपने कर्तव्य और धर्म से विमुख होने लगता है, तब परमात्मा स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। यही सनातन सत्य है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्घोषित किया—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”इसी दिव्य वचन की साक्षात् अभिव्यक्ति हैं भगवान श्रीराम, जिनका अवतरण चैत्र शुक्ल नवमी को अयोध्या में हुआ। यह दिवस केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सत्य, मर्यादा, त्याग और राष्ट्रधर्म का महान पर्व है।सनातन धर्म — अनादि, अनन्त और अनुपम सत्यसनातन धर्म कोई संकीर्ण विचारधारा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण का शाश्वत विज्ञान है। यह न किसी एक युग का, न किसी एक व्यक्ति का — यह तो अनादि काल से प्रवाहित वह दिव्य धारा है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अमूल्य संदेश दिया।“धर्मो रक्षति रक्षितः”अर्थात् — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।यह धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्य और सत्य का मार्ग है। अन्य पंथ समय के साथ उत्पन्न हुए, परन्तु सनातन धर्म स्वयं सृष्टि के साथ प्रकट हुआ — अतः यह अनुपम, अनमोल, अद्भुत और अविस्मरणीय है।श्रीराम — आदर्श, राष्ट्रधर्म और त्याग की मूर्तिभगवान श्रीराम ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि धर्म ही सर्वोपरि है — चाहे उसके लिए राज्य त्यागना पड़े, वनवास सहना पड़े या युद्ध करना पड़े।“रामो विग्रहवान् धर्मः”— श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।उन्होंने यह भी सिखाया कि राष्ट्रधर्म, व्यक्तिगत सुख से कहीं ऊपर है। जब व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित होता है, तब उसका जीवन ही तपस्या बन जाता है।राष्ट्रधर्म — सर्वोच्च धर्म“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”— माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”आज के युवाओं के लिए यह संदेश अत्यंत आवश्यक है—जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य से विमुख हो जाता है, उसका जीवन अधूरा रह जाता है। राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन का परम कर्तव्य है। यही सच्चा सनातन धर्म है।युवा शक्ति के लिए दिव्य संदेशहे भारत के युवा!तुम केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस महान संस्कृति के वाहक हो। तुम्हारे भीतर श्रीराम की मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण की नीति और ऋषियों की तपस्या का तेज विद्यमान है।अपने जीवन को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के लिए समर्पित करो —यही सच्ची साधना है, यही सच्चा पुरुषार्थ।

श्री रामनवमी हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देती, बल्कि यह हमें अपने भीतर धर्म, राष्ट्रभक्ति और आत्मबल जाग्रत करने का दिव्य संदेश देती है।“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न…

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक : “नवरात्रि महापर्व में कन्या-पूजन का महत्व”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी – ज्योतिषाचार्य) की कलम से-जब सृष्टि में अधर्म, असंतुलन और अराजकता का विस्तार होता है, तब परमशक्ति आदिशक्ति दुर्गा अपने विविध स्वरूपों में अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करती हैं। नवरात्रि महापर्व उसी दिव्य शक्ति के जागरण का अद्भुत उत्सव है, जो मनुष्य को बाह्य और आंतरिक दोनों स्तरों पर शुद्ध, सशक्त और सजग बनाता है।नवरात्रि के नौ दिव्य दिनों में माँ भगवती के नौ रूपों की उपासना के उपरांत कन्या-पूजन किया जाता है, जो सनातन धर्म की गहन आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। कन्याएँ इस सृष्टि में साक्षात् देवी का रूप मानी गई हैं—निर्मल, निष्कलुष और ऊर्जा की मूर्त अभिव्यक्ति।कन्या-पूजन का शास्त्रीय और पौराणिक आधार-शास्त्रों में नारी और शक्ति के महत्व को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ उनका अनादर होता है, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।देवी महात्म्य में भी वर्णित है—“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”अर्थात् जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।अतः कन्या-पूजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना का सम्मान है जो प्रत्येक कन्या में विद्यमान है।नवरात्रि : आत्मशुद्धि और जीवन-परिवर्तन का पर्व-नवरात्रि मनुष्य को संयम, साधना और आत्मनियंत्रण का संदेश देती है।“श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।”अर्थात् श्रद्धावान और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करता है।यदि मनुष्य नवरात्रि के व्रत, नियम, जप, ध्यान और सेवा को अपने जीवन में अपनाता है, तो उसका जीवन स्वतः ही परिष्कृत और तेजस्वी हो जाता है। नवरात्रि केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का मार्ग है।भारतीय संस्कृति : विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति क्यों?आज सम्पूर्ण विश्व में अशांति, संघर्ष, स्वार्थ और असंतुलन की स्थिति व्याप्त है। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति ही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की शिक्षा देती है—“वसुधैव कुटुम्बकम्”भारतीय संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति, संतुलन और जीवन जीने की कला सिखाती है। यहाँ प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश देखा जाता है, प्रत्येक नारी में देवी का रूप और प्रत्येक प्राणी में आत्मा का दर्शन किया जाता है।यही कारण है कि श्री सत्य सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का सनातन सत्य है—बाकी सभी केवल पंथ, सम्प्रदाय और मत हैं, जो समय के साथ उत्पन्न हुए हैं।शिक्षा में सनातन संस्कृति का समावेश : राष्ट्र निर्माण का आधार-यदि हमारी शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत तथा ऋषि-मुनियों की परंपरा को स्थान दिया जाए, तो हमारी युवा पीढ़ी—(i) संस्कारवान बनेगी,(ii) चरित्रवान बनेगी,(iii) राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत होगी!“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”ऐसी शिक्षा से युक्त युवा ही राष्ट्र के सच्चे प्रहरी बनेंगे और भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पद पर स्थापित करेंगे।नवरात्रि का राष्ट्र और समाज को संदेशनवरात्रि हमें यह प्रेरणा देती है कि—धर्म की रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य हैस्त्री सम्मान ही समाज की उन्नति का मूल हैशक्ति और भक्ति का संतुलन ही जीवन की सफलता हैयदि मानव इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन निखर उठता है और समाज तथा राष्ट्र दोनों सशक्त बनते हैं।सनातन का सार्वभौम संदेश-आज जब विश्व में उथल-पुथल, अशांति और दिशा-भ्रम की स्थिति है, तब केवल भारतीय संस्कृति ही वह प्रकाश स्तंभ है जो सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार के रूप में जीना सिखाती है।आइए, हम सब मिलकर इस सत्य को स्वीकार करें—प्रेम से बोलिए — “श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!”जय हिन्द! जय भारत! जय भारतीय संस्कृति!🕉️ “ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “जीभ: विनाश और निर्माण का अदृश्य शस्त्र”जब इस सृष्टि में मनुष्य अपने कर्म, वचन और विचारों से अपने भाग्य का निर्माण करता है, तब उसमें “वाणी” का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य की जीभ (वाणी) ही उसका सबसे सूक्ष्म, परंतु अत्यंत प्रभावशाली अस्त्र है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी-ज्योतिषाचार्य)”वाणी: संस्कारों का—“प्राणी की वाणी ही बता देती है कि उसकी परवरिश किस प्रकार के खानदान से ताल्लुक रखती है।”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं—“वस्त्र केवल शरीर को सजाते हैं, परंतु वाणी आत्मा के संस्कारों को प्रकट करती है।”शास्त्र प्रमाण —“आचारः कुलमाख्याति, देशमाख्याति भाषणम्।”अर्थ: आचरण से कुल का और वाणी से संस्कारों का ज्ञान होता है।कटु वाणी: विनाश का कारण-इतिहास साक्षी है कि असंयमित वाणी ने बड़े-बड़े विनाश किए हैं।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का कथन है—“एक कठोर शब्द वह अग्नि है, जो वर्षों के स्नेह को भस्म कर सकती है।”शास्त्र वचन —“शब्दबाणात् निवारणं नास्ति”अर्थ: शब्द रूपी बाण का कोई प्रतिकार नहीं होता।मधुर वाणी: निर्माण का आधार-वहीं दूसरी ओर—पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं— “मधुर वाणी वह अमृत है, जो शत्रु को भी मित्र बना सकती है।”शास्त्र प्रमाण —“मधुरं हि वचः श्रेयः, मधुरं हि परं धनम्।”अर्थ: मधुर वचन ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा धन है।राष्ट्र निर्माण में संस्कारों की भूमिका-आज के युग में सबसे बड़ा दायित्व है—राष्ट्र की भावी पीढ़ी में सुंदर, श्रेष्ठ और सदाचारी संस्कारों का समावेश करना।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का स्पष्ट संदेश है—“यदि बालक के वचनों में मधुरता और संस्कार आ जाएँ, तो वह स्वयं ही राष्ट्र का आदर्श नागरिक बन जाता है।”शास्त्र वचन —“सा विद्या या विमुक्तये”अर्थ: वही विद्या श्रेष्ठ है, जो मनुष्य को उच्च मार्ग पर ले जाए।संस्कार और राष्ट्रभक्ति-पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी के अनुसार— “संस्कारयुक्त वाणी ही राष्ट्रभक्ति की पहली सीढ़ी है।”यदि हम अपने बच्चों को—सत्य बोलना सिखाएँमधुर वाणी का अभ्यास कराएँधर्म और कर्तव्य का बोध दें, तब शास्त्र के अनुसार—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”अर्थ: माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।ऐसे संस्कारों से युक्त बालक ही आगे चलकर सच्चे राष्ट्रभक्त बनते हैं, जो मातृभूमि की सेवा तन, मन और धन से करते हैं।अतः हे मानव! अपने वचनों को संयमित, मधुर और संस्कारित बनाओ।यही तुम्हारा वास्तविक आभूषण है, यही तुम्हारे कुल और राष्ट्र की पहचान है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का अंतिम संदेश—“वाणी को सुधारो, जीवन स्वयं सुधर जाएगा; वाणी को बिगाड़ो, सब कुछ बिगड़ जाएगा।”“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”🕉️ ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)जय हिन्द — जय भारत — जय भारतीय संस्कृति

सिविल लाइन थाना में समाधान दिवस, त्वरित निस्तारण के निर्देश!

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “श्री रामनवमी महापर्व की मंगलमयी वंदना!”श्री रामनवमी: धर्म, मर्यादा और राष्ट्रचेतना का दिव्य महा-उत्सवजब-जब इस धरा पर अधर्म का अंधकार गहराता है, जब मानव अपने कर्तव्य और धर्म से विमुख होने लगता है, तब परमात्मा स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। यही सनातन सत्य है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्घोषित किया—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”इसी दिव्य वचन की साक्षात् अभिव्यक्ति हैं भगवान श्रीराम, जिनका अवतरण चैत्र शुक्ल नवमी को अयोध्या में हुआ। यह दिवस केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सत्य, मर्यादा, त्याग और राष्ट्रधर्म का महान पर्व है।सनातन धर्म — अनादि, अनन्त और अनुपम सत्यसनातन धर्म कोई संकीर्ण विचारधारा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण का शाश्वत विज्ञान है। यह न किसी एक युग का, न किसी एक व्यक्ति का — यह तो अनादि काल से प्रवाहित वह दिव्य धारा है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अमूल्य संदेश दिया।“धर्मो रक्षति रक्षितः”अर्थात् — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।यह धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्य और सत्य का मार्ग है। अन्य पंथ समय के साथ उत्पन्न हुए, परन्तु सनातन धर्म स्वयं सृष्टि के साथ प्रकट हुआ — अतः यह अनुपम, अनमोल, अद्भुत और अविस्मरणीय है।श्रीराम — आदर्श, राष्ट्रधर्म और त्याग की मूर्तिभगवान श्रीराम ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि धर्म ही सर्वोपरि है — चाहे उसके लिए राज्य त्यागना पड़े, वनवास सहना पड़े या युद्ध करना पड़े।“रामो विग्रहवान् धर्मः”— श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।उन्होंने यह भी सिखाया कि राष्ट्रधर्म, व्यक्तिगत सुख से कहीं ऊपर है। जब व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित होता है, तब उसका जीवन ही तपस्या बन जाता है।राष्ट्रधर्म — सर्वोच्च धर्म“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”— माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”आज के युवाओं के लिए यह संदेश अत्यंत आवश्यक है—जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य से विमुख हो जाता है, उसका जीवन अधूरा रह जाता है। राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन का परम कर्तव्य है। यही सच्चा सनातन धर्म है।युवा शक्ति के लिए दिव्य संदेशहे भारत के युवा!तुम केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस महान संस्कृति के वाहक हो। तुम्हारे भीतर श्रीराम की मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण की नीति और ऋषियों की तपस्या का तेज विद्यमान है।अपने जीवन को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के लिए समर्पित करो —यही सच्ची साधना है, यही सच्चा पुरुषार्थ।

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक : “नवरात्रि महापर्व में कन्या-पूजन का महत्व”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी – ज्योतिषाचार्य) की कलम से-जब सृष्टि में अधर्म, असंतुलन और अराजकता का विस्तार होता है, तब परमशक्ति आदिशक्ति दुर्गा अपने विविध स्वरूपों में अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करती हैं। नवरात्रि महापर्व उसी दिव्य शक्ति के जागरण का अद्भुत उत्सव है, जो मनुष्य को बाह्य और आंतरिक दोनों स्तरों पर शुद्ध, सशक्त और सजग बनाता है।नवरात्रि के नौ दिव्य दिनों में माँ भगवती के नौ रूपों की उपासना के उपरांत कन्या-पूजन किया जाता है, जो सनातन धर्म की गहन आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। कन्याएँ इस सृष्टि में साक्षात् देवी का रूप मानी गई हैं—निर्मल, निष्कलुष और ऊर्जा की मूर्त अभिव्यक्ति।कन्या-पूजन का शास्त्रीय और पौराणिक आधार-शास्त्रों में नारी और शक्ति के महत्व को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ उनका अनादर होता है, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।देवी महात्म्य में भी वर्णित है—“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”अर्थात् जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।अतः कन्या-पूजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना का सम्मान है जो प्रत्येक कन्या में विद्यमान है।नवरात्रि : आत्मशुद्धि और जीवन-परिवर्तन का पर्व-नवरात्रि मनुष्य को संयम, साधना और आत्मनियंत्रण का संदेश देती है।“श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।”अर्थात् श्रद्धावान और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करता है।यदि मनुष्य नवरात्रि के व्रत, नियम, जप, ध्यान और सेवा को अपने जीवन में अपनाता है, तो उसका जीवन स्वतः ही परिष्कृत और तेजस्वी हो जाता है। नवरात्रि केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का मार्ग है।भारतीय संस्कृति : विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति क्यों?आज सम्पूर्ण विश्व में अशांति, संघर्ष, स्वार्थ और असंतुलन की स्थिति व्याप्त है। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति ही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की शिक्षा देती है—“वसुधैव कुटुम्बकम्”भारतीय संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति, संतुलन और जीवन जीने की कला सिखाती है। यहाँ प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश देखा जाता है, प्रत्येक नारी में देवी का रूप और प्रत्येक प्राणी में आत्मा का दर्शन किया जाता है।यही कारण है कि श्री सत्य सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का सनातन सत्य है—बाकी सभी केवल पंथ, सम्प्रदाय और मत हैं, जो समय के साथ उत्पन्न हुए हैं।शिक्षा में सनातन संस्कृति का समावेश : राष्ट्र निर्माण का आधार-यदि हमारी शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत तथा ऋषि-मुनियों की परंपरा को स्थान दिया जाए, तो हमारी युवा पीढ़ी—(i) संस्कारवान बनेगी,(ii) चरित्रवान बनेगी,(iii) राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत होगी!“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”ऐसी शिक्षा से युक्त युवा ही राष्ट्र के सच्चे प्रहरी बनेंगे और भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पद पर स्थापित करेंगे।नवरात्रि का राष्ट्र और समाज को संदेशनवरात्रि हमें यह प्रेरणा देती है कि—धर्म की रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य हैस्त्री सम्मान ही समाज की उन्नति का मूल हैशक्ति और भक्ति का संतुलन ही जीवन की सफलता हैयदि मानव इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन निखर उठता है और समाज तथा राष्ट्र दोनों सशक्त बनते हैं।सनातन का सार्वभौम संदेश-आज जब विश्व में उथल-पुथल, अशांति और दिशा-भ्रम की स्थिति है, तब केवल भारतीय संस्कृति ही वह प्रकाश स्तंभ है जो सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार के रूप में जीना सिखाती है।आइए, हम सब मिलकर इस सत्य को स्वीकार करें—प्रेम से बोलिए — “श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!”जय हिन्द! जय भारत! जय भारतीय संस्कृति!🕉️ “ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “जीभ: विनाश और निर्माण का अदृश्य शस्त्र”जब इस सृष्टि में मनुष्य अपने कर्म, वचन और विचारों से अपने भाग्य का निर्माण करता है, तब उसमें “वाणी” का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य की जीभ (वाणी) ही उसका सबसे सूक्ष्म, परंतु अत्यंत प्रभावशाली अस्त्र है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी-ज्योतिषाचार्य)”वाणी: संस्कारों का—“प्राणी की वाणी ही बता देती है कि उसकी परवरिश किस प्रकार के खानदान से ताल्लुक रखती है।”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं—“वस्त्र केवल शरीर को सजाते हैं, परंतु वाणी आत्मा के संस्कारों को प्रकट करती है।”शास्त्र प्रमाण —“आचारः कुलमाख्याति, देशमाख्याति भाषणम्।”अर्थ: आचरण से कुल का और वाणी से संस्कारों का ज्ञान होता है।कटु वाणी: विनाश का कारण-इतिहास साक्षी है कि असंयमित वाणी ने बड़े-बड़े विनाश किए हैं।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का कथन है—“एक कठोर शब्द वह अग्नि है, जो वर्षों के स्नेह को भस्म कर सकती है।”शास्त्र वचन —“शब्दबाणात् निवारणं नास्ति”अर्थ: शब्द रूपी बाण का कोई प्रतिकार नहीं होता।मधुर वाणी: निर्माण का आधार-वहीं दूसरी ओर—पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं— “मधुर वाणी वह अमृत है, जो शत्रु को भी मित्र बना सकती है।”शास्त्र प्रमाण —“मधुरं हि वचः श्रेयः, मधुरं हि परं धनम्।”अर्थ: मधुर वचन ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा धन है।राष्ट्र निर्माण में संस्कारों की भूमिका-आज के युग में सबसे बड़ा दायित्व है—राष्ट्र की भावी पीढ़ी में सुंदर, श्रेष्ठ और सदाचारी संस्कारों का समावेश करना।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का स्पष्ट संदेश है—“यदि बालक के वचनों में मधुरता और संस्कार आ जाएँ, तो वह स्वयं ही राष्ट्र का आदर्श नागरिक बन जाता है।”शास्त्र वचन —“सा विद्या या विमुक्तये”अर्थ: वही विद्या श्रेष्ठ है, जो मनुष्य को उच्च मार्ग पर ले जाए।संस्कार और राष्ट्रभक्ति-पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी के अनुसार— “संस्कारयुक्त वाणी ही राष्ट्रभक्ति की पहली सीढ़ी है।”यदि हम अपने बच्चों को—सत्य बोलना सिखाएँमधुर वाणी का अभ्यास कराएँधर्म और कर्तव्य का बोध दें, तब शास्त्र के अनुसार—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”अर्थ: माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।ऐसे संस्कारों से युक्त बालक ही आगे चलकर सच्चे राष्ट्रभक्त बनते हैं, जो मातृभूमि की सेवा तन, मन और धन से करते हैं।अतः हे मानव! अपने वचनों को संयमित, मधुर और संस्कारित बनाओ।यही तुम्हारा वास्तविक आभूषण है, यही तुम्हारे कुल और राष्ट्र की पहचान है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का अंतिम संदेश—“वाणी को सुधारो, जीवन स्वयं सुधर जाएगा; वाणी को बिगाड़ो, सब कुछ बिगड़ जाएगा।”“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”🕉️ ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)जय हिन्द — जय भारत — जय भारतीय संस्कृति

सिविल लाइन थाना में समाधान दिवस, त्वरित निस्तारण के निर्देश!

मुजफ्फरनगर। थाना सिविल लाइन में पुलिस अधीक्षक नगर सत्यनारायण प्रजापत द्वारा समाधान दिवस आयोजित कर जनसमस्याएं सुनी गईं तथा उनके त्वरित व गुणवत्तापूर्ण निस्तारण हेतु संबंधित अधिकारियों को मौके पर…

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “श्री रामनवमी महापर्व की मंगलमयी वंदना!”श्री रामनवमी: धर्म, मर्यादा और राष्ट्रचेतना का दिव्य महा-उत्सवजब-जब इस धरा पर अधर्म का अंधकार गहराता है, जब मानव अपने कर्तव्य और धर्म से विमुख होने लगता है, तब परमात्मा स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। यही सनातन सत्य है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्घोषित किया—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”इसी दिव्य वचन की साक्षात् अभिव्यक्ति हैं भगवान श्रीराम, जिनका अवतरण चैत्र शुक्ल नवमी को अयोध्या में हुआ। यह दिवस केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सत्य, मर्यादा, त्याग और राष्ट्रधर्म का महान पर्व है।सनातन धर्म — अनादि, अनन्त और अनुपम सत्यसनातन धर्म कोई संकीर्ण विचारधारा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण का शाश्वत विज्ञान है। यह न किसी एक युग का, न किसी एक व्यक्ति का — यह तो अनादि काल से प्रवाहित वह दिव्य धारा है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अमूल्य संदेश दिया।“धर्मो रक्षति रक्षितः”अर्थात् — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।यह धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्य और सत्य का मार्ग है। अन्य पंथ समय के साथ उत्पन्न हुए, परन्तु सनातन धर्म स्वयं सृष्टि के साथ प्रकट हुआ — अतः यह अनुपम, अनमोल, अद्भुत और अविस्मरणीय है।श्रीराम — आदर्श, राष्ट्रधर्म और त्याग की मूर्तिभगवान श्रीराम ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि धर्म ही सर्वोपरि है — चाहे उसके लिए राज्य त्यागना पड़े, वनवास सहना पड़े या युद्ध करना पड़े।“रामो विग्रहवान् धर्मः”— श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।उन्होंने यह भी सिखाया कि राष्ट्रधर्म, व्यक्तिगत सुख से कहीं ऊपर है। जब व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित होता है, तब उसका जीवन ही तपस्या बन जाता है।राष्ट्रधर्म — सर्वोच्च धर्म“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”— माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”आज के युवाओं के लिए यह संदेश अत्यंत आवश्यक है—जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य से विमुख हो जाता है, उसका जीवन अधूरा रह जाता है। राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन का परम कर्तव्य है। यही सच्चा सनातन धर्म है।युवा शक्ति के लिए दिव्य संदेशहे भारत के युवा!तुम केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस महान संस्कृति के वाहक हो। तुम्हारे भीतर श्रीराम की मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण की नीति और ऋषियों की तपस्या का तेज विद्यमान है।अपने जीवन को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के लिए समर्पित करो —यही सच्ची साधना है, यही सच्चा पुरुषार्थ।

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक : “नवरात्रि महापर्व में कन्या-पूजन का महत्व”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी – ज्योतिषाचार्य) की कलम से-जब सृष्टि में अधर्म, असंतुलन और अराजकता का विस्तार होता है, तब परमशक्ति आदिशक्ति दुर्गा अपने विविध स्वरूपों में अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करती हैं। नवरात्रि महापर्व उसी दिव्य शक्ति के जागरण का अद्भुत उत्सव है, जो मनुष्य को बाह्य और आंतरिक दोनों स्तरों पर शुद्ध, सशक्त और सजग बनाता है।नवरात्रि के नौ दिव्य दिनों में माँ भगवती के नौ रूपों की उपासना के उपरांत कन्या-पूजन किया जाता है, जो सनातन धर्म की गहन आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। कन्याएँ इस सृष्टि में साक्षात् देवी का रूप मानी गई हैं—निर्मल, निष्कलुष और ऊर्जा की मूर्त अभिव्यक्ति।कन्या-पूजन का शास्त्रीय और पौराणिक आधार-शास्त्रों में नारी और शक्ति के महत्व को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ उनका अनादर होता है, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।देवी महात्म्य में भी वर्णित है—“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”अर्थात् जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।अतः कन्या-पूजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना का सम्मान है जो प्रत्येक कन्या में विद्यमान है।नवरात्रि : आत्मशुद्धि और जीवन-परिवर्तन का पर्व-नवरात्रि मनुष्य को संयम, साधना और आत्मनियंत्रण का संदेश देती है।“श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।”अर्थात् श्रद्धावान और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करता है।यदि मनुष्य नवरात्रि के व्रत, नियम, जप, ध्यान और सेवा को अपने जीवन में अपनाता है, तो उसका जीवन स्वतः ही परिष्कृत और तेजस्वी हो जाता है। नवरात्रि केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का मार्ग है।भारतीय संस्कृति : विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति क्यों?आज सम्पूर्ण विश्व में अशांति, संघर्ष, स्वार्थ और असंतुलन की स्थिति व्याप्त है। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति ही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की शिक्षा देती है—“वसुधैव कुटुम्बकम्”भारतीय संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति, संतुलन और जीवन जीने की कला सिखाती है। यहाँ प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश देखा जाता है, प्रत्येक नारी में देवी का रूप और प्रत्येक प्राणी में आत्मा का दर्शन किया जाता है।यही कारण है कि श्री सत्य सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का सनातन सत्य है—बाकी सभी केवल पंथ, सम्प्रदाय और मत हैं, जो समय के साथ उत्पन्न हुए हैं।शिक्षा में सनातन संस्कृति का समावेश : राष्ट्र निर्माण का आधार-यदि हमारी शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत तथा ऋषि-मुनियों की परंपरा को स्थान दिया जाए, तो हमारी युवा पीढ़ी—(i) संस्कारवान बनेगी,(ii) चरित्रवान बनेगी,(iii) राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत होगी!“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”ऐसी शिक्षा से युक्त युवा ही राष्ट्र के सच्चे प्रहरी बनेंगे और भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पद पर स्थापित करेंगे।नवरात्रि का राष्ट्र और समाज को संदेशनवरात्रि हमें यह प्रेरणा देती है कि—धर्म की रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य हैस्त्री सम्मान ही समाज की उन्नति का मूल हैशक्ति और भक्ति का संतुलन ही जीवन की सफलता हैयदि मानव इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन निखर उठता है और समाज तथा राष्ट्र दोनों सशक्त बनते हैं।सनातन का सार्वभौम संदेश-आज जब विश्व में उथल-पुथल, अशांति और दिशा-भ्रम की स्थिति है, तब केवल भारतीय संस्कृति ही वह प्रकाश स्तंभ है जो सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार के रूप में जीना सिखाती है।आइए, हम सब मिलकर इस सत्य को स्वीकार करें—प्रेम से बोलिए — “श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!”जय हिन्द! जय भारत! जय भारतीय संस्कृति!🕉️ “ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “जीभ: विनाश और निर्माण का अदृश्य शस्त्र”जब इस सृष्टि में मनुष्य अपने कर्म, वचन और विचारों से अपने भाग्य का निर्माण करता है, तब उसमें “वाणी” का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य की जीभ (वाणी) ही उसका सबसे सूक्ष्म, परंतु अत्यंत प्रभावशाली अस्त्र है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी-ज्योतिषाचार्य)”वाणी: संस्कारों का—“प्राणी की वाणी ही बता देती है कि उसकी परवरिश किस प्रकार के खानदान से ताल्लुक रखती है।”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं—“वस्त्र केवल शरीर को सजाते हैं, परंतु वाणी आत्मा के संस्कारों को प्रकट करती है।”शास्त्र प्रमाण —“आचारः कुलमाख्याति, देशमाख्याति भाषणम्।”अर्थ: आचरण से कुल का और वाणी से संस्कारों का ज्ञान होता है।कटु वाणी: विनाश का कारण-इतिहास साक्षी है कि असंयमित वाणी ने बड़े-बड़े विनाश किए हैं।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का कथन है—“एक कठोर शब्द वह अग्नि है, जो वर्षों के स्नेह को भस्म कर सकती है।”शास्त्र वचन —“शब्दबाणात् निवारणं नास्ति”अर्थ: शब्द रूपी बाण का कोई प्रतिकार नहीं होता।मधुर वाणी: निर्माण का आधार-वहीं दूसरी ओर—पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं— “मधुर वाणी वह अमृत है, जो शत्रु को भी मित्र बना सकती है।”शास्त्र प्रमाण —“मधुरं हि वचः श्रेयः, मधुरं हि परं धनम्।”अर्थ: मधुर वचन ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा धन है।राष्ट्र निर्माण में संस्कारों की भूमिका-आज के युग में सबसे बड़ा दायित्व है—राष्ट्र की भावी पीढ़ी में सुंदर, श्रेष्ठ और सदाचारी संस्कारों का समावेश करना।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का स्पष्ट संदेश है—“यदि बालक के वचनों में मधुरता और संस्कार आ जाएँ, तो वह स्वयं ही राष्ट्र का आदर्श नागरिक बन जाता है।”शास्त्र वचन —“सा विद्या या विमुक्तये”अर्थ: वही विद्या श्रेष्ठ है, जो मनुष्य को उच्च मार्ग पर ले जाए।संस्कार और राष्ट्रभक्ति-पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी के अनुसार— “संस्कारयुक्त वाणी ही राष्ट्रभक्ति की पहली सीढ़ी है।”यदि हम अपने बच्चों को—सत्य बोलना सिखाएँमधुर वाणी का अभ्यास कराएँधर्म और कर्तव्य का बोध दें, तब शास्त्र के अनुसार—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”अर्थ: माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।ऐसे संस्कारों से युक्त बालक ही आगे चलकर सच्चे राष्ट्रभक्त बनते हैं, जो मातृभूमि की सेवा तन, मन और धन से करते हैं।अतः हे मानव! अपने वचनों को संयमित, मधुर और संस्कारित बनाओ।यही तुम्हारा वास्तविक आभूषण है, यही तुम्हारे कुल और राष्ट्र की पहचान है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का अंतिम संदेश—“वाणी को सुधारो, जीवन स्वयं सुधर जाएगा; वाणी को बिगाड़ो, सब कुछ बिगड़ जाएगा।”“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”🕉️ ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)जय हिन्द — जय भारत — जय भारतीय संस्कृति

घरेलू LPG सिलेंडर के 14.2 kg से 10 kg करने की चर्चा पर पेट्रोलियम मंत्रालय की सचिव ने कहा है कि “यह सिर्फ अफवाह है. सरकार अफवाहों का जवाब नहीं देती. हम बार बार यही अपील कर रहे हैं कि अफवाहों पर ध्यान न दें.”*गुजरात में पेट्रोल पंप ड्राई आउट की खबरों पर सुजाता शर्मा ने कहा कि “सभी पेट्रोल पंप सामान्य रूप से चल रहे हैं. किसी पेट्रोल पंप में ड्राई आउट नहीं है. हमने फील्ड से जानकरी ली है.”

सिविल लाइन थाना में समाधान दिवस, त्वरित निस्तारण के निर्देश!

मुजफ्फरनगर। थाना सिविल लाइन में पुलिस अधीक्षक नगर सत्यनारायण प्रजापत द्वारा समाधान दिवस आयोजित कर जनसमस्याएं सुनी गईं तथा उनके त्वरित व गुणवत्तापूर्ण निस्तारण हेतु संबंधित अधिकारियों को मौके पर…

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “श्री रामनवमी महापर्व की मंगलमयी वंदना!”श्री रामनवमी: धर्म, मर्यादा और राष्ट्रचेतना का दिव्य महा-उत्सवजब-जब इस धरा पर अधर्म का अंधकार गहराता है, जब मानव अपने कर्तव्य और धर्म से विमुख होने लगता है, तब परमात्मा स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। यही सनातन सत्य है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उद्घोषित किया—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”इसी दिव्य वचन की साक्षात् अभिव्यक्ति हैं भगवान श्रीराम, जिनका अवतरण चैत्र शुक्ल नवमी को अयोध्या में हुआ। यह दिवस केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सत्य, मर्यादा, त्याग और राष्ट्रधर्म का महान पर्व है।सनातन धर्म — अनादि, अनन्त और अनुपम सत्यसनातन धर्म कोई संकीर्ण विचारधारा नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण का शाश्वत विज्ञान है। यह न किसी एक युग का, न किसी एक व्यक्ति का — यह तो अनादि काल से प्रवाहित वह दिव्य धारा है, जिसने सम्पूर्ण विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अमूल्य संदेश दिया।“धर्मो रक्षति रक्षितः”अर्थात् — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।यह धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, कर्तव्य और सत्य का मार्ग है। अन्य पंथ समय के साथ उत्पन्न हुए, परन्तु सनातन धर्म स्वयं सृष्टि के साथ प्रकट हुआ — अतः यह अनुपम, अनमोल, अद्भुत और अविस्मरणीय है।श्रीराम — आदर्श, राष्ट्रधर्म और त्याग की मूर्तिभगवान श्रीराम ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि धर्म ही सर्वोपरि है — चाहे उसके लिए राज्य त्यागना पड़े, वनवास सहना पड़े या युद्ध करना पड़े।“रामो विग्रहवान् धर्मः”— श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।उन्होंने यह भी सिखाया कि राष्ट्रधर्म, व्यक्तिगत सुख से कहीं ऊपर है। जब व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित होता है, तब उसका जीवन ही तपस्या बन जाता है।राष्ट्रधर्म — सर्वोच्च धर्म“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”— माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”आज के युवाओं के लिए यह संदेश अत्यंत आवश्यक है—जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य से विमुख हो जाता है, उसका जीवन अधूरा रह जाता है। राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि जीवन का परम कर्तव्य है। यही सच्चा सनातन धर्म है।युवा शक्ति के लिए दिव्य संदेशहे भारत के युवा!तुम केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस महान संस्कृति के वाहक हो। तुम्हारे भीतर श्रीराम की मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण की नीति और ऋषियों की तपस्या का तेज विद्यमान है।अपने जीवन को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के लिए समर्पित करो —यही सच्ची साधना है, यही सच्चा पुरुषार्थ।

श्री रामनवमी हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देती, बल्कि यह हमें अपने भीतर धर्म, राष्ट्रभक्ति और आत्मबल जाग्रत करने का दिव्य संदेश देती है।“ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न…

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक : “नवरात्रि महापर्व में कन्या-पूजन का महत्व”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी – ज्योतिषाचार्य) की कलम से-जब सृष्टि में अधर्म, असंतुलन और अराजकता का विस्तार होता है, तब परमशक्ति आदिशक्ति दुर्गा अपने विविध स्वरूपों में अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करती हैं। नवरात्रि महापर्व उसी दिव्य शक्ति के जागरण का अद्भुत उत्सव है, जो मनुष्य को बाह्य और आंतरिक दोनों स्तरों पर शुद्ध, सशक्त और सजग बनाता है।नवरात्रि के नौ दिव्य दिनों में माँ भगवती के नौ रूपों की उपासना के उपरांत कन्या-पूजन किया जाता है, जो सनातन धर्म की गहन आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। कन्याएँ इस सृष्टि में साक्षात् देवी का रूप मानी गई हैं—निर्मल, निष्कलुष और ऊर्जा की मूर्त अभिव्यक्ति।कन्या-पूजन का शास्त्रीय और पौराणिक आधार-शास्त्रों में नारी और शक्ति के महत्व को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ उनका अनादर होता है, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।देवी महात्म्य में भी वर्णित है—“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”अर्थात् जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।अतः कन्या-पूजन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना का सम्मान है जो प्रत्येक कन्या में विद्यमान है।नवरात्रि : आत्मशुद्धि और जीवन-परिवर्तन का पर्व-नवरात्रि मनुष्य को संयम, साधना और आत्मनियंत्रण का संदेश देती है।“श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।”अर्थात् श्रद्धावान और इन्द्रियों को संयमित रखने वाला व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करता है।यदि मनुष्य नवरात्रि के व्रत, नियम, जप, ध्यान और सेवा को अपने जीवन में अपनाता है, तो उसका जीवन स्वतः ही परिष्कृत और तेजस्वी हो जाता है। नवरात्रि केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का मार्ग है।भारतीय संस्कृति : विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति क्यों?आज सम्पूर्ण विश्व में अशांति, संघर्ष, स्वार्थ और असंतुलन की स्थिति व्याप्त है। ऐसे समय में भारतीय संस्कृति ही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की शिक्षा देती है—“वसुधैव कुटुम्बकम्”भारतीय संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति, संतुलन और जीवन जीने की कला सिखाती है। यहाँ प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश देखा जाता है, प्रत्येक नारी में देवी का रूप और प्रत्येक प्राणी में आत्मा का दर्शन किया जाता है।यही कारण है कि श्री सत्य सनातन धर्म केवल एक धर्म नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का सनातन सत्य है—बाकी सभी केवल पंथ, सम्प्रदाय और मत हैं, जो समय के साथ उत्पन्न हुए हैं।शिक्षा में सनातन संस्कृति का समावेश : राष्ट्र निर्माण का आधार-यदि हमारी शिक्षा प्रणाली में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत तथा ऋषि-मुनियों की परंपरा को स्थान दिया जाए, तो हमारी युवा पीढ़ी—(i) संस्कारवान बनेगी,(ii) चरित्रवान बनेगी,(iii) राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत होगी!“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।”ऐसी शिक्षा से युक्त युवा ही राष्ट्र के सच्चे प्रहरी बनेंगे और भारतवर्ष को पुनः विश्वगुरु के पद पर स्थापित करेंगे।नवरात्रि का राष्ट्र और समाज को संदेशनवरात्रि हमें यह प्रेरणा देती है कि—धर्म की रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य हैस्त्री सम्मान ही समाज की उन्नति का मूल हैशक्ति और भक्ति का संतुलन ही जीवन की सफलता हैयदि मानव इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन निखर उठता है और समाज तथा राष्ट्र दोनों सशक्त बनते हैं।सनातन का सार्वभौम संदेश-आज जब विश्व में उथल-पुथल, अशांति और दिशा-भ्रम की स्थिति है, तब केवल भारतीय संस्कृति ही वह प्रकाश स्तंभ है जो सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार के रूप में जीना सिखाती है।आइए, हम सब मिलकर इस सत्य को स्वीकार करें—प्रेम से बोलिए — “श्री सत्य सनातन धर्म की सदा जय!”जय हिन्द! जय भारत! जय भारतीय संस्कृति!🕉️ “ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!”आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)

🕉️ धर्म संसार — “धर्मो रक्षति रक्षितः”विशेषांक — “जीभ: विनाश और निर्माण का अदृश्य शस्त्र”जब इस सृष्टि में मनुष्य अपने कर्म, वचन और विचारों से अपने भाग्य का निर्माण करता है, तब उसमें “वाणी” का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य की जीभ (वाणी) ही उसका सबसे सूक्ष्म, परंतु अत्यंत प्रभावशाली अस्त्र है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी (वेदपाठी-ज्योतिषाचार्य)”वाणी: संस्कारों का—“प्राणी की वाणी ही बता देती है कि उसकी परवरिश किस प्रकार के खानदान से ताल्लुक रखती है।”पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं—“वस्त्र केवल शरीर को सजाते हैं, परंतु वाणी आत्मा के संस्कारों को प्रकट करती है।”शास्त्र प्रमाण —“आचारः कुलमाख्याति, देशमाख्याति भाषणम्।”अर्थ: आचरण से कुल का और वाणी से संस्कारों का ज्ञान होता है।कटु वाणी: विनाश का कारण-इतिहास साक्षी है कि असंयमित वाणी ने बड़े-बड़े विनाश किए हैं।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का कथन है—“एक कठोर शब्द वह अग्नि है, जो वर्षों के स्नेह को भस्म कर सकती है।”शास्त्र वचन —“शब्दबाणात् निवारणं नास्ति”अर्थ: शब्द रूपी बाण का कोई प्रतिकार नहीं होता।मधुर वाणी: निर्माण का आधार-वहीं दूसरी ओर—पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी कहते हैं— “मधुर वाणी वह अमृत है, जो शत्रु को भी मित्र बना सकती है।”शास्त्र प्रमाण —“मधुरं हि वचः श्रेयः, मधुरं हि परं धनम्।”अर्थ: मधुर वचन ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा धन है।राष्ट्र निर्माण में संस्कारों की भूमिका-आज के युग में सबसे बड़ा दायित्व है—राष्ट्र की भावी पीढ़ी में सुंदर, श्रेष्ठ और सदाचारी संस्कारों का समावेश करना।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का स्पष्ट संदेश है—“यदि बालक के वचनों में मधुरता और संस्कार आ जाएँ, तो वह स्वयं ही राष्ट्र का आदर्श नागरिक बन जाता है।”शास्त्र वचन —“सा विद्या या विमुक्तये”अर्थ: वही विद्या श्रेष्ठ है, जो मनुष्य को उच्च मार्ग पर ले जाए।संस्कार और राष्ट्रभक्ति-पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी के अनुसार— “संस्कारयुक्त वाणी ही राष्ट्रभक्ति की पहली सीढ़ी है।”यदि हम अपने बच्चों को—सत्य बोलना सिखाएँमधुर वाणी का अभ्यास कराएँधर्म और कर्तव्य का बोध दें, तब शास्त्र के अनुसार—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”अर्थ: माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।ऐसे संस्कारों से युक्त बालक ही आगे चलकर सच्चे राष्ट्रभक्त बनते हैं, जो मातृभूमि की सेवा तन, मन और धन से करते हैं।अतः हे मानव! अपने वचनों को संयमित, मधुर और संस्कारित बनाओ।यही तुम्हारा वास्तविक आभूषण है, यही तुम्हारे कुल और राष्ट्र की पहचान है।पंडित धर्मराज यज्ञनारायण भट्ट जी का अंतिम संदेश—“वाणी को सुधारो, जीवन स्वयं सुधर जाएगा; वाणी को बिगाड़ो, सब कुछ बिगड़ जाएगा।”“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”🕉️ ब्रह्म परम्परा कभी नष्ट न हो!आभार — पंडित राकेश कुमार कौशिक (शिक्षाविद्)जय हिन्द — जय भारत — जय भारतीय संस्कृति